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निष्ठामूर्ति कस्तूरबा
महात्मा गाँधी जैसे महान पुरूष की सहधर्मचारिणी के तौर पर पूज्य कस्तूरबा के बारें में राष्ट्र को आदर मालूम स्वाभाविक है। राष्ट्र ने महात्मा जी को 'बापू जी' के नाम से राष्ट्रीयता के स्थान पर कायम किया ही है। इसलिए कस्तूरबा भी 'बा' के एकाक्षरी नाम से राष्ट्रमाता बन सकी है।

किन्तु महात्मा जी के साथ के सम्बन्ध के कारण ही नहीं, बल्कि अपने आन्तरिक सद्गुण और निष्ठा के कारण भी कस्तूरबा राष्ट्रमाता बन पायी है। चाहे दक्षिण अफ्रीका में हो या हिन्दुस्तान में, सरकार के खिलाफ लड़ाई के समय जब-जब चारित्र्य का तेज प्रकट करने का मौका आया, कस्तूरबा हमेशा इस दिव्य कसौटी से सफलतापूर्वक पार हुई है।

इससे भी विशेष बात यह है कि बड़ी तेजी से बदलते हुए आज के युग में भी आर्य सती स्त्री का जो आदर्श हिन्दुस्तान ने अपने हृदय में कायम रखा है, उस आदर्श की जीवित प्रतिमा के रूप में राष्ट्र पूज्य कस्तूरबा को पहचानता है। इस तरह की विविध लोकोत्तर योग्यता के कारण आज सारा राष्ट्र कस्तूरबा की पूजा करता है।

कस्तूरबा अनपढ़ थी। हम यह भी कह सकते है कि उनका भाषा ज्ञान सामान्य देहाती से अधिक नहीं था। दक्षिण अफ्रीका में रही, इसलिए वह कुछ अंग्रेजी समझ सकती थी और पचीस-तीस शब्द बोल भी लेती थी। मिस्टर एण्ड्रूज जैसे कोई विदेश मेहमान घर आने पर उन शब्दों की पूँजी से वह अपना काम चला लेती और कभी-कभी तो उनके उस सम्भाषण से विनोद भी पैदा हो जाता।

कस्तूरबा को गीता के ऊपर असाधारण श्रद्धा थी। पढ़ाने वाला कोई मिले तो वह भक्तिपूर्वक गीता पढ़ने के लिए बैठ जाती, किन्तु उनकी गाड़ी कभी भी बहुत आगे नहीं जा सकी। फिर भी आगाखाँ महल में -कारावास के दरमियान-उन्होंने बार-बार गीता के पाठ लेने की कोशिश चालू रखी थी।

उनकी निष्ठा का पात्र दूसरा ग्रन्थ था तुलसी-रामायण। बड़ी मुश्किल से दोपहर के समय उनको आधे घण्टे की जो फुरसत मिलती थी, उसमें वह बड़े अक्षरों में छपी तुलसी-रामायण के दोहे, चश्मा चढ़ाकर पढ़ने बैठती थी। उनका यह चित्र देखकर हमें बड़ा मजा आता। कस्तूरबा रामायण भी ठीक ढंग से कभी न पढ़ सकी। राष्ट्रीय सन्त तलसीदास के द्वारा लिखा हुआ सती-सीता का वर्णन भले ही वह ठीक न समझ सकी हो, फिर भी प्रत्यक्ष सती-सीता तो बन ही सकी।

दुनिया में दो अमोघ शक्तियाँ है ― शब्द और कृति। इसमें कोई शक नहीं कि 'शब्दों' ने सारी पृथ्वी को हिला दिया है, किन्तु अन्तिम शक्ति तो 'कृति' की है। महात्माजी ने इन दोनों शक्तियों की असाधारण उपासना की है। कस्तूरबा ने इन दोनों शक्तियों में से अधिक श्रेष्ठ शक्ति 'कृति' की नम्रता के साथ उपासना करके सन्तोष माना और जीवन-सिद्धि प्राप्त की।

दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने जब उन्हें जेल भेज दिया, कस्तूरबा ने अपना बचाव तक नहीं किया। न कोई सनसनाती पैदा करने वाला निवेदन प्रकट किया। "मुझे तो वह कानून तोड़ना ही है जो यह कहता है कि मैं महात्मा जी की धर्म पत्नी नहीं हूँ।" इतना कहकर वह सीधे जेल में चली गयी। जेल में उनकी तेजस्विता तोड़ने की कोशिशें वहाँ की सरकार ने बहुत की किन्तु अन्त में सरकार की उस समय की जिद्द ही टूट गयी।

डॉक्टर ने जब उन्हें धर्मविरूद्धक खुराक लेने की बात कही तब भी उन्होंने धर्मनिष्ठा पर कोई व्याख्यान नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा - "मुझे अखाद्य खाना खाकर जीना नहीं है, फिर भले ही मुझे मौत का सामना करना पड़े।"

कस्तूरबा की कसौटी केवल सरकार ने ही की हो तो ऐसी बात नहीं है। खुद महात्मा जी ने भी कई बार उनसे कठोर और मर्मस्पर्शी बातें कही, तब भी उन्होंने हार काबुल नहीं की। पति का अनुसरण करना ही सती का कर्त्तव्य है, ऐसी निष्ठा होने के कारण मन में किसी प्रकार का सन्देह लाए बिना वह धर्म के मामलों में पति का अनुसरण करती रही।

कस्तूरबा के प्रथम दर्शन मुझे शान्ति निकेतन में हुये। सन् 1915 के प्रारम्भ में जब महात्मा जी वहाँ पधारे, तब स्वागत का शुभारम्भ पूरा होते ही सब लोगों ने सोने की तैयारियाँ की। आँगन के बीच एक चबूतरा था। महात्मा जी ने कहा, हम दोनों यहीं सोयेंगे। अगल-बगल में बिस्तरे बिछाकर बापू और बा सो गये और हम सब लोग आँगन में आस-पास अपने बिस्तरे बिछाकर सो गये। उस दिन मुझे लगा, मानों मुझे आध्यात्मिक माँ-बाप मिल गये है।

उनके आखिरी दर्शन मुझे उस समय हुए जब वह बिड़ला हाउस में गिरफ्तार की गयी। महात्मा जी को गिरफ्तार करने के लिए सरकार की ओर से कस्तूरबा को कहा गया, 'अगर आपकी इच्छा हो तो आप भी साथ में चल सकती है।' बा बोली, 'अगर आप गिरफ्तार करें तो मैं जाऊँगी वरना आने की तैयारी मेरी नहीं है।' महात्मा जी जिस सभा में बोलने वाले थे उस सभा में जाने का उन्होंने निश्चय किया था। पति के गिरफ्तार होने के बाद उनका काम आगे चलाने की जिम्मेदारी बा ने कई बार उठाई है। शाम के समय जब वह व्याख्यान के लिए निकल पड़ी, सरकारी अमलदारों ने आकर उनसे कहा, 'माता जी सरकार का कहना है कि आप घर पर ही रहे, सभा में जाने का कष्ट न उठाये।' बा ने उस समय उन्हें न देश-सेवा का महत्व समझाया और न उन्होंने उन्हें 'देशद्रोह करने वाले तुम कुत्ते हो' कहकर उनकी निर्भत्सना ही की। उन्होंने एक ही वाक्य में सरकार की सूचना का जवाब दिया, 'सभा में जाने का निश्चय मेरा पक्का है, मैं जाऊँगी ही।'

आगाखाँ महल में खाने-पीने की कोई तकलीफ नहीं थी। हवा की दृष्टि से भी स्थान अच्छा था। महात्मा जी का सहवास भी था। किन्तु कस्तूरबा के लिए - यह विचार ही असह्य हुआ कि 'मैं कैद में हूँ।' उन्होनें कई बार कहा - "मुझे यहाँ का वैभव कतई नहीं चाहिए, मुझे तो सेवाग्राम की कुटिया ही पसन्द है।" सरकार ने उनके शरीर को कैद रखा किन्तु उनकी आत्मा को वह कैद सहन नहीं हुई। जिस प्रकार पिंजड़े का पक्षी प्राणों का त्याग करके बन्धनमुक्त हो जाता है उसी प्रकार कस्तूरबा ने सरकार की कैद में अपना शरीर छोड़ा और वह स्वतंत्र हुई। उनके इस मूक किन्तु तेजस्वी बलिदान के कारण अंग्रेजी साम्राज्य की नींव ढीली हुई और हिन्दुस्तान पर उनकी हुकूमत कमजोर हुई। कस्तूरबा ने अपनी कृतिनिष्ठा के द्वारा यह दिखा दिया कि शुद्ध और रोचक साहित्य के पहाड़ों की अपेक्षा कृति का एक कण अधिक मूल्यवान् और आबदार होता है। शब्द शास्त्र में जो लोग निपुण होते है, उनको कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य की हमेशा ही विचिकित्सा करनी पड़ती है। कृतिनिष्ठ लोगों को ऐसी दुविधा कभी परेशान नहीं कर पाती। कस्तूरबा के सामने उनका कर्त्तव्य किसी दीये के समान स्पष्ट था। कभी कोई चर्चा शुरू हो जाती, तब 'मुझसे यही होगा' और 'यह नहीं होगा' ― इन दो वाक्यों में ही अपना फैसला सुना देती।

आश्रम में कस्तूरबा हम लोगों के लिए माँ के समान थी। सत्याग्रहाश्रम यानी तत्त्वनिष्ठ महात्मा जी की संस्था थी। उग्राशासक मगनलाल भाई उसे चलाते थे। ऐसे स्थान पर अगर वात्सल्य की आर्द्रता हमें मिलती थी तो वह कस्तूरबा से ही। कई बार बा आश्रम के नियमों को ताक पर रख देती। आश्रम के बच्चों को जब भूख लगती थी तब उनकी बात बा ही सुनती थी। नियमनिष्ठ लोगों ने बा के खिलाफ कई बार शिकायतें करके देखी, किन्तु महात्मा जी को अन्त में हार खाकर निर्णय देना पड़ा अपने नियम बा को लागू नहीं होते।

आश्रम में चाहें बड़े-बड़े नेता आये या मामूली कार्यकर्त्ता आये, उनके खाने-पीने की पूछताछ अत्यन्त प्रेम के साथ यदि किसी ने की है तो वह पूज्य कस्तूरबा ने ही की। आलस्य ने तो उनको कभी छुआ तक नहीं। किसी प्राणघातक बीमारी से मुक्त होकर चंगी हुई हो और शरीर में जरा-सी शक्ति आयी हो कि तुरन्त बा आश्रम की रसोई में जाकर काम करने लग जाती। ठेठ आखिर में उनके हाथ-पाँव थक गये थे, शरीर जीर्ण-शीर्ण हुआ था। मुँह में एक दाँत बचा नहीं था। आँखें निस्तेज हो गयी थी तब भी रसोई में जाती और जो काम बन सके, आस्थापूर्वक करती। मैं जब उनसे मिलने जाता और जब वह खाने के लिए मुझे कुछ देती, तब छोटे बच्चों की तरह हाथ फैलाने में मुझे असाधारण धन्यता का अनुभव होता था।

वह भले ही अशिक्षित रही हो, संस्था चलाने की जिम्मेदारी लेने की महत्वाकांक्षा भले ही उनमें कभी जागी नहीं हो, देश में क्या चल रहा है और उसकी सूक्ष्म जानकारी वह प्रश्न पूछ-पूछकर या अखबारों के ऊपर नजर डालकर प्राप्त कर ही लेती थी।

महात्मा जी जब जेल में थे, तब दो-तीन बार राजकीय परिषदों का या शिक्षण सम्मेलनों के अध्यक्ष का स्थान कस्तूरबा को लेना पड़ा था। उनके अध्यक्षीय भाषण लिख देने का काम मुझे करना पड़ा था। मैंने उनसे कहा - "मैं अपनी ओर से एक भी दलील भाषण में नहीं लाऊँगा। आप जो बतावेंगी, मैं ठीक भाषा में लिख दूँगा।" हाँ-ना कहकर वह अपने भाषण की दलीलें मुझे बता देती। उस समय उनकी वह शक्ति देखकर मैं चकित हो जाता था।

अध्यक्षीय भाषण किसी से लिखवा लेना आसान है। लेकिन परिषद जब समाप्त होती है, तब उसका उपसंहार करना हर एक को अपनी प्रत्युत्पन्नमति से करना पड़ता है। जब कस्तूरबा ने अपने उपसंहार के भाषण किये, उनकी भाषा बहुत ही आसान रहती थी, किन्तु उपसंहार परिपूर्ण सिद्ध होता था। इनके इन भाषणों में परिस्थिति की समझ, भाषा की सावधानी और खानदानी की महत्ता आदि गुण उत्कृष्टता से दिखायी देते थे।

आज के जमाने में स्त्री-जीवन सम्बन्ध के हमारे आदर्श हमने काफी बदल लिये है। आज कोई स्त्री अगर कस्तूरबा की तरह अशिक्षित रहे और किसी तरह महत्त्वाकांक्षा का उदय उसमें न दिखाई दे तो हम उसका जीवन यशस्वी या कृतार्थ नहीं कहेंगे। ऐसी हालत में जब कस्तूरबा की मृत्यु हुई, पूरे देश ने स्वयं स्फूर्ति से उनका स्मारक बनाने का तय किया। और सहज इकट्ठी न हो पाये, इतनी बड़ी निधि इकट्ठी कर दिखायी। इससे यह सिद्ध होता है कि हमारा प्राचीन तेजस्वी आदर्श अब देशमान्य है। हमारी संस्कृति को जड़े आज भी काफी मजबूत है।

यह सब श्रेष्ठता या महत्ता कस्तूरबा में कहाँ से आयी? उनकी जीवन-साधना किस प्रकार की थी? शिक्षण के द्वारा उन्होंने बाहर से कुछ नहीं लिया था। सचमुच, उनमें तो आर्य आदर्श को शोभा देने वाले कौटुम्बिक सद्गुण ही थे। असाधारण मौका मिलते ही और उतनी ही असाधारण कसौटी आ पड़ते ही उन्होंने स्वभावसिद्ध कौटुम्बिक सद्गुण व्यापक किये और उनके जोरों हर समय जीवन-सिद्धि हासिल की। सूक्ष्म प्रमाण में या छोटे पैमाने पर जो शुद्ध साधना की जाती है, उसका तेज इतना लोकोत्तरी होता है कि चाई कितना ही बड़ा प्रसंग आ पड़े या व्यापक प्रमाण में कसौटी हो, चारित्र्यवान मनुष्य को अपनी शक्ति का सिर्फ गुणाकार ही करने का होता है।

सती कस्तूरबा सिर्फ अपने संस्कार बल के कारण पातिव्रत्य को, कुटुम्ब-वत्सलता को और तेजस्विता को चिपकाये रही और उसी के जोरों महात्मा जी के माहात्म्य के बराबरी में आ सकी। आज हिन्दू, मुस्लिम, पारसी, सिख, बौद्ध, ईसाई आदि अनेक धर्मी लोगों का यह विशाल देश अत्यन्त निष्ठा के साथ कस्तूरबा की पूजा करता है और स्वातंत्र्य के पूर्व की शिवरात्रि के दिन उनका स्मरण करके सब लोग अपनी-अपनी तेजस्विता को अधिक तेजस्वी बनाते है।
GuruNanak Dev
कार्तिकी पूर्णिमा इस देश की बहुत पवित्र तिथि है। इस दिन सरे भारतवर्ष में कोई-न-कोई उत्सव, मेला, स्नान या अनुष्ठान होता है। शरतकाल का पूर्ण चन्द्रमा इस दिन अपने पूरे वैभव पर होता है। आकाश निर्मल, दिशाएँ प्रसन्न, वायुमण्डल शान्त, पृथ्वी हरी-भरी, जलप्रवाह मृदुमंथर हो जाता है। कुछ आश्चर्य नहीं कि इस दिन मनुष्य का सामूहिक चित्त उद्वेलित हो उठे। इसी दिन महान गुरू नानकदेव के आविर्भाव का उत्सव मनाया जाता है। आकाश में जिस प्रकार षोडश कला से पूर्ण चन्द्रमा अपनी कोमल स्निग्ध किरणों से प्रकाशित होता है, उसी प्रकार मानव चित्त में भी किसी उज्ज्वल प्रसन्न ज्योतिपुंज का आविर्भाव होना स्वाभाविक है। गुरु नानकदेव ऐसे ही षोडश कला से पूर्ण स्निग्ध ज्योति महामानव थे। लोकमानस में अर्से से कार्तिकी पूर्णिमा के साथ गुरु के आविर्भाव को सम्बन्ध जोड़ दिया गया है। गुरु किसी एक ही दिन को पार्थिव शरीर में आविर्भूत हुए होंगे, पर भक्तों के चित्त में वे प्रतिक्षण प्रकट हो सकते हैं। पार्थिव रूप को महत्त्व दिया जाता है, परन्तु प्रतिक्षण आविर्भूत होने को आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक महत्त्व मिलना चाहिए। इतिहास के पण्डित गुरु के पार्थिव शरीर के आविर्भाव के विषय में वादविवाद करते रहें, इस देश का सामूहिक मानव चित्त उतना महत्त्व नहीं देता।

गुरु जिस किसी भी शुभ क्षण में चित्त में आविर्भूत हो जायँ, वही क्षण उत्सव का है, वही क्षण उल्लसित कर देने के लिए पर्याप्त है। नवो नवो भवसि जायमानः- गुरु, तुम प्रतिक्षण चित्तभूमि में आविर्भूत होकर नित्य नवीन हो रहे हो। हजारों वर्षों से शरतकाल की यह सर्वाधिक प्रसन्न तिथि प्रभामण्डित पूर्णचन्द्र के साथ उतनी ही मीठी ज्योति के धनी महामानव का स्मरण कराती रही है। इस चन्द्रमा के साथ महामानवों का सम्बन्ध जोड़ने में इस देश का समष्टि चित्त, आह्लाद अनुभव करता है। हम ‘रामचन्द्र’, ‘कृष्णचन्द्र’ आदि कहकर इसी आह्लाद को प्रकट करते हैं। गुरु नानकदेव के साथ इस पूर्णचन्द्र का सम्बन्ध जोड़ना भारतीय जनता के मानस के अनुकूल है। आज वह अपना आह्लाद प्रकट करती है।

गुरू नानकदेव का आविर्भाव आज से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व हुआ। भारतवर्ष की मिट्टी में युग के अनुरूप महापुरूषों को जन्म देने का अद्भुत गुण है। आज से पाँच सौ वर्ष पहले का देश अनेक कुसंस्कारों में उलझा था। जातियों, सम्प्रदायों, धर्मों, और संकीर्ण कुलाभिमानों से वह खण्ड-विच्छित्र हो गया था। देश में नये धर्म के आगन्तुकों के कारण एक ऐसी समस्या उठ खड़ी हुई थी, जो इस देश के हजारों वर्षों के लम्बे इतिहास में अपरिचित थी। ऐसे ही दुर्घट काल में इस देश की मिट्टी ने ऐसे अनेक महापुरुषों को उत्पन्न किया, जो सड़ी रूढ़ियों, मृतप्राय आचारों, बासी विचारों और अर्थहीन संकीर्णताओं के विरुद्ध प्रहार करने में कुण्ठित नहीं हुए और इन जर्जर बातों से परे सबमें विद्यमान सबको नयी ज्योति और नया जीवन प्रदान करने वाले महान् जीवन-देवता की महिमा प्रतिष्ठित करने में समर्थ हुए। इन सन्तों की ज्योतिष्क कुण्डली में गुरू नानकदेव ऐसे सन्त है, जो शरतकाल के पूर्णचन्द्र की तरह ही स्निग्ध, उसी प्रकार शान्त-निर्मल, उसी प्रकार रश्मि के भण्डार थे। कई सन्तों ने कस-कस के चोटें मारी; व्यंग्य बाण छोड़े, तर्क की छुरी चलायी, पर महान गुरू नानकदेव ने सुधा-लेप का काम किया। यह आश्चर्य की बात है कि विचार और आचार की दुनिया में इतनी बड़ी क्रान्ति ले आनेवाला यह सन्त इतने मधुर, इतने स्निग्ध, इतने मोहक वचनों को बोलने वाला है। किसी का दिल दुखाये बिना, किसी पर आघात किये बिना, कुसंस्कारों को छिन्न करने की शक्ति रखनेवाला, नयी संजीवनी धारा से प्राणिमात्र को उल्लसित करनेवाला यह सन्त मध्यकाल की ज्योतिष्क मण्डली में अपनी निराली शोभा से शरत् पूर्णिमा के पूर्णचन्द्र की तरह ज्योतिष्मान् है। आज उसकी याद आये बिना नहीं रह सकती। वह सब प्रकार से लोकोत्तर है। उसका उपचार प्रेम और मैत्री है। उसका शास्त्र सहानुभूति और हित-चिन्ता है। वह कुसंस्कारों के अन्धकार को अपनी स्निग्ध-ज्योति से भेदता है, मुमूर्ष प्राणधारा को अमृत का भाण्ड उँड़ेलकर प्रवाहशील बनाता है। वह भेदों में अभेद देखता है, नानात्व में एक का संधान बनाता है, वह सब प्रकार से निराला है। इस कार्तिक पूर्णिमा को अनायास उसके चरणों में नत हो जाने की इच्छा होती है।

गुरु नानक ने प्रेम का सन्देश दिया है; क्योंकि मनुष्य-जीवन का जो चरम प्राप्तव्य है, वह स्वयं प्रेमरूप है। प्रेम ही उसका स्वभाव है, प्रेम ही उसका साधन है। अरे ओ मुग्ध मनुष्य, सच्ची प्रीति से ही तेरा मान-अभिमान नष्ट होगा, तेरी छोटाई की सीमा समाप्त होगी, परम मंगलमय शिव तुझे प्राप्त होगा। उसी सच्चे प्रेम की साधना तेरे जीवन का परम लक्ष्य है। बाह्य आडम्बरों को तू धर्म समझ रहा है। मूल संस्कारों को तू आस्था मानता है? नहीं प्यारे, यह सब धर्म नहीं है। धर्म तो स्वयं रूप होकर भगवान् के रूप में तेरे भीतर विराजमान है। उसी अगम-अगोचर प्रभु की शरण पकड़। क्या पड़ा है इन छोटे अहंकारों में। ये मुक्ति के नहीं, बंधन के हेतु है। उनका मत था कि विश्व का परित्याग कर संन्यास लेना ईश्वर की दृष्टि में आवश्यक नहीं है, उसके लिए तो धार्मिक संन्यास तथा भक्त व गृहस्थ सभी समान है। उन्होंने मृत्यु-पर्यन्त, हिन्दू-मुसलमानों के तीव्र मतभेदों को दूर करने की सफल चेष्टा की। इनके शिष्यों में हिन्दू व मुसलमानों दोनों ही थे। इनके अनुयायी बाद में सिख कहलाये और उन्होंने अनेक सिद्धान्तों को 'ग्रन्थ-साहब' में संगृहीत किया।

धन्य हो, हे अगम, अगोचर, अलख, अपार देव, तुम्हीं मेरी चिन्ता करो। जहाँ तक देखता हूँ वहाँ तक जल में, थल में, पृथ्वी में सर्वत्र तुम्हारी ही लीला व्याप्त है, घट-घट में तुम्हारी ज्योति उद्भासित हो रही है -
अगम अगोचर अलख अपारा, चिन्ता करहु हमारी।
जलि थलि माही अलि भरिपुरि घट घट ज्योति तुम्हारी॥

अद्भुत है गुरु की बानी की सहज बेधक शक्ति। कहीं कोई आडम्बर नहीं, कोई बनावट नहीं, सहज हृदय से निकली हुई सहज प्रभावित करने की अपार शक्ति। सहज जीवन बड़ी कठिन साधना है। सहज भाषा बड़ी बलवती आस्था है। सीधी लकीर खींचना टेढ़ा काम है। गुरु का अनाडम्बर सहज धर्म ऐसी ही सहजवाणी से प्रचारित हो सकता था। कितनी अद्भुत निरभिमान शैली है। कहीं भी पांडित्य का दुर्धर बोझ नहीं और फिर भी पंडितों को आन्दोलित करने वाली यह वाणी धन्य है -
कोई पड़ता सहसा किरता कोई पड़ै पुराना
कोई नामु जपै जपमाली लागै तिसै धिआना
अब ही कब ही किछू न जाना।
तेरा एको नामु पछाना
न जाणा हरे मेरी कवन गते
हम मूरख अगिआन सरनि प्रभु तेरी
करि किरपा राखहु मेरी लाज पते।

ऐसी मीठी निरहंकारी सीधी वाणी से गुरू ने भटकती जनता को उसका लक्ष्य बताया। आज विद्वान चकित है, पण्डित अचरज में है - कितनी बड़ी ताकत और कैसे निरीह रूप? कालिदास ने ठीक कहा था - ध्रुवं वपुः काञ्चनपद्मनिर्मितम् मृदुप्रकृत्या च ससारमेव च। जो रूप से स्वर्णकमल के धर्मवाला होता है वह निश्चय ही स्वाभाव से मृदु होता है, किन्तु सारवान् भी होता है। गुरू नानकदेव ऐसे ही कांचन पदमधर्मी महामानव थे - मृदुप्रकृत्या च ससारमेव च।

किसी लकीर को मिटाये बिना छोटी बना देने का उपाय है बड़ी लकीर खींच देना। क्षुद्र अहमिकाओं और अर्थहीन संकीर्णताओं की क्षुद्रता सिद्ध करने के लिए तर्क और शास्त्रार्थ का मार्ग कदाचित् ठीक नहीं है। सही उपाय है बड़े सत्य को प्रत्यक्ष कर देना। गुरु नानक ने यही किया। उन्होंने जनता को बड़े-से-बड़े सत्य के सम्मुखीन कर दिया, हजारों दीये उस महाज्योति के सामने स्वयं फीके पड़ गये।

भगवान् जब अनुग्रह करते हैं तो अपनी दिव्य ज्योति ऐसे महान् सन्तों में उतार देते हैं। एक बार जब यह ज्योति मानव देह को आश्रय करके उतरती है तो चुपचाप नहीं बैठती। वह क्रियात्मक होती है, नीचे गिरे हुए अभाजन लोगों को वह प्रभावित करती है, ऊपर उठाती है। वह उतरती है और ऊपर उठाती है। इसे पुराने पारिभाषिक शब्दों में कहें तो कुछ इस प्रकार होगा कि एक ओर उसका ‘अवतार’ होता है, दूसरी ओर औरों का उद्धार होता है। अवतार और उद्धार की यह लीला भगवान् के प्रेम का सक्रिय रूप है, जिसे पुराने भक्तजन ‘अनुग्रह’ कहते है। आज से लगभग पाँच सौ वर्ष से पहले परम प्रेयान् हरि का यह ‘अनुग्रह’ सक्रिय हुआ था, वह आज भी क्रियाशील है। आज कदाचित् गुरु की वाणी की सबसे अधिक तीव्र आवश्यकता अनुभूत हो रही है।

महागुरु, नयी आशा, नयी उमंग, नये उल्लास की आशा में आज इस देश की जनता तुम्हारे चरणों में प्रणति निवेदन कर रही है। आशा की ज्योति विकीर्ण करो, मैत्री और प्रीति की स्निग्ध धारा से आप्लावित करो। हम उलझ गये है, भटक गये है, पर कृतज्ञता अब भी हम में रह गयी है। आज भी हम तुम्हारी अमृतोपम वाणी को भूल नहीं गये हैं। कृतज्ञ भारत को प्रणाम अंगीकार करो।

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